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Friday, March 25, 2011

एक क्रिकेट मैच के बाद मुझे मिली सीमित दिव्य द्रष्टि से देखा हुआ एक द्रश्य

सोचा था तीन चार दिन या फिर एक हफ्ता अब नहीं लिखूंगा और सिर्फ पढूंगा लेकिन कल के क्रिकेट मैच(भारत आस्ट्रेलिया क्वार्टरफाइनल ) के बाद जो हालात बने हैं उनके बाद लगता है नहीं लिखा तो पेट में दर्द होने लगेगा..

वैसे इस मैच के बाद किसी का कोई भला हुआ हो या ना हुआ हो मुझे एक वरदान मिल गया था वो है सीमित दिव्य द्रष्टि का वरदान, सीमित कैसे वो अभी बताता हूँ .... मुझे अचानक ही भविष्य की कुछ घटनाएँ दिखने लगी थी मै कोशिश करता हूँ उन द्रश्यों को यहाँ चित्रित करने के
"
बुर्के में दो महिलाये सब्जी खरीद रही थी और एक बेच रही थोड़ी देर बाद पता चला की वो तीनो ही क्रिकेट खिलाडी हैं और ऐसे ही कई मजाक मोबाइल संदेशो के जरिये आना जाना शुरू हो गए हैं

अखबारों में खबर पढ़ने को मिली की उन्मादी भीड़ ने क्रिकेट खिलाडियों के घर पर पत्थर फैंके और उनके पुतले जलाये, 

टीवी पर उन्ही खिलाडियों के बारे में ऐसे ऐसे ताने मारे जा रहे हैं की वो खिलाडी बेचारे शर्म से मर जाये जिनके बारे में चंद दिन पहले ऐसे शब्द सुनने को मिल रहे थे मानो वो इश्वर के भेजे हुए दूत हैं, मुल्क के सच्चे हीरे हैं.

सारे अखबारों और टीवी समाचारों में उन खिलाडियों पर शब्दों के अत्याचार किये जा रहे हैं की वो सब बेचारगी की हद तक दुखी हो चुके हैं."

अब ये ना पून्छियेगा की ये किस देश के खिलाडियों के बारे में ऐसा कहा जा रहा है क्योंकि मेरी सिमित दिव्य द्रष्टि से मै सिर्फ इतना ही देख पाया था की ये या तो पाकिस्तानी खिलाडियों की हालत है या फिर भारतीय खिलाडियों की.

और मै आपको भरोसा दिलाता हूँ की ३० मार्च के बाद दोनों देशो में से किसी एक देश में यही हालत होगी क्योंकि जब भारत और पाकिस्तान का क्रिकेट मैच हो तो ये मात्र खेल नहीं युद्ध हो जाता है और लोग इसे खेल की बजाय अपनी शान का विषय बना लेते हैं. और दोनों ही देशो में क्रिकेट ऐसा धर्म है जिसकी इबादत और पूजा दोनों ही देशो में सामान रूप से की जाती है. ये तो तय है की दोनों में से एक देश उस दिन इस विश्व कप प्रतियोगीता से बाहर हो जायेगा और उसका सबसे बड़ा खामियाजा भुगतना पड़ेगा बाहर होने वाले देश के खिलाडियों को.

दोनों देशो के सभी क्रिकेटान्ध जाने क्यों ये नहीं समझते की कोई भी खिलाडी अपना नाम अमर क्यों नहीं करना चाहेगा, कोई भी जान बुझ कर इस जगह से बाहर नहीं होना चाहता, लेकिन इस हार की खीज हम सब मिल कर उन पर उतारते हैं जो पहले ही निराश और दुखी होते हैं.

 मै इस खेल का कोई ज्ञाता नहीं हूँ और ना ही मै किसी का पक्ष लेने की कोशिश कर रहा हूँ पर मै बस हमारे देश में जो तरीका होता है खिलाडियों को देखने का या उनसे उम्मीद करने का उसमे बदलाव की मांग करता हूँ.

क्रिकेट में देश को एक करने की जो बात है उसके लिए मै ना नहीं करूँगा उस बारे में पहले ही मेरी पोस्ट भारत में देशप्रेम एकता और क्रिकेट में लिख चूका हूँ लेकिन ये पोस्ट समर्पित है सभी क्रिकेटान्धों को.

अगर एक व्यक्ति भी मेरी इस पोस्ट से खुद को बदल सके तो सोचूंगा की मेरा लिखना सफल हो गया

Wednesday, March 23, 2011

We are basically from India completely Indian: Teaching given by father


Today if someone ask me “Basically from where you are” and my answer remain “I am from India completely Indian”

It’s not the same answer that I used to give before 8 years. At that time I used to say “I am from this State and this region” but one fine day someone asked me this question in a function and on my answer I got one slap on my back head (filled with lot of love) from my dad and a teaching that neither I can forget nor I want to forget.

Dad heard my answer and said “son we are not from any particular state but we are from this country, we are completely Indian”.

With these wording of my father many people who were there had a question mark on their faces and I kept waiting for more explanation from my father.

Now I am trying to write what dad said that time as he said.

Father said “we are not of a particular state or region but the entire nation is ours and we are part of nation. When mom became pregnant for me my mom-dad was in Maharashtra, I was born in Uttar Pradesh and the first food that I ate was earned in Maharashtra.  Whatever amount of literacy that I have I learnt it in Bihar, the girl with whom I married spent her half-life in Gujarat, when I left my home for the first time, I went to Punjab and I learnt first lesson of earning in my life. After that I worked for some time in Delhi, Mumbai, Gujarat and Rajasthan and I got my permanent job in Madhya Pradesh. The guy who gave me my job was a south Indian. Presently my home is In Madhya Pradesh my kids are born and brought up here and no one can say anything about their destiny then how we can be just from any particular state. For me entire nation is mine and I am of this nation and now one has any right who can deny me on this point. If I am a part of this nation how my kids can be different than me.

Few of well-educated people who were seating there opposed my dad and even insulted him with wordings like illiterate but my father was confident on his thoughts and he always taught us that “we are from country not from any particular state”.

Few of those we educated people suggested my father to love his root and soil and response of my father was “soil of this entire nation is mine only then why I should say any particular places soil is mine. Today you are asking me to say I should give more value to my state over nation, then in my district people will say I should give more value to my district over the state, my fellow villagers will ask me to give more value to village over district and inside the village particular colony will expect more value over village. If I follow your guidance than I will have to give more value to smaller places over each bigger place to show love of my soil, I can’t do that because soil of entire nation is mine and all these places are included in nation.

Few so called well educated and very intelligent people also gave a taunt on dad “an illiterate think he is superior to others” but I love my dad and his teaching.

 He taught me to be an Indian and unity.

Generally on my blog I say please give your opinion but if your thinking is different than my dad please keep it with you and don’t give your comments on this post.

Tuesday, March 22, 2011

प्रेम और सौहाद्र के त्योहार होली पर बढती दूरियाँ


आज से कुछ साल पहले और अभी की होली में जाने कैसे एक बड़ा अंतर आ गया है

पहले होली सौहाद्र और आपसी भाई चारे का त्योहार हुआ करता था लेकिन अब लगता है ये ही त्योहार एक दुसरे से ना केवल बदला निकालने का साधन बन गया है बल्कि कही कही एक दुसरे को अपने से छोटा साबित करना का अखाडा भी बन गया है.

मुझे अच्छी तरह से याद है आज से ८-९ पहले हमारे पूरे मोहल्ले में सिर्फ एक ही होली जला करती थी आज हालत ये हैं की  ४०० मकानों के इस मोहल्ल्ले में घर के बाहर खड़े हो कर ही ८-९ होलीयाँ गिनी जा सकती हैं. जब ये देखा तो दिल जाने किस खटास से भर गया और मुझे वो समय याद आने लगा जब मोहल्ले में होली जलाने का जिम्मा हमारी टोली उठाया करती थी और होली के २१ दिन पहले से ही तय्यारी शुरू कर दी जाती थी. पूरे मोहल्ले में सिर्फ एक ही टोली हुआ करती थी जिसके पास होली जलाने का अधिकार हुआ करता था और इस टोली में शामिल होने के लिए किसी को मनाही नहीं थी.

कभी किसी ने बागी हो कर एक नई टोली बनाने या दूसरी किसी जगह होली जलाने की कोशिश की तो उसका मुह होली के कई दिन पहले ही रंगों से लाल हो जाता था और उस टोली की होली रात होते ही मुख्य होली में शामिल हो जाती थी. मुख्य टोली की तरफ से फ़तवा जारी कर दिया जाता "कोई भी बागी टोली को चंदा नहीं देगा अन्यथा उसका हर्जाना चंदा देने वालो के खटिया और दरवाजो को होली में शामिल कर के किया जायेगा". इस पूरे संस्मरण में जो बात सबसे ज्यादा अच्छी हुआ करती थी वो थी व्यस्को की तरफ से एक ही होली जलाने को मिलने वाला सहयोग.

आज हालत ये हैं की कुछ जगहों पर तो मात्र २० कदमो के अंतर पर ही होली जल रही है और व्यस्को द्वारा बच्चो का साथ देते हुए बड़े ही गर्व के साथ कहा जाता है ये हमारी होली है और हम इस होली में ही पूजा करेंगे.

ये देखने के लिए क्या ऐसा माहौल सिर्फ एक मोहल्ले में ही है या हमारी होली वाली ये बीमारी हर और फैली है मै शहर में निकला और देखा तो देख कर दिल में सिर्फ खटास ही बढ़ी और कुछ नहीं. लगभग यही स्थिति हर मोहल्ले में हर गली और यहाँ तक की हर खास सड़क पर देखने को मिली. जहा भी रुक कर मैंने ३-४ होली दहन मात्र १०० फिट के दायरे में क्यों हो रहा है ये जानने की कोशिश की तो जवाब में मिलने वाले शब्द चाहे कुछ भी रहे हो उन शब्दों का मतलब मात्र यही था की हम भी श्रेष्ठ है और हम होली दहन क्यों ना करे

छोटे और किशोर उम्र के बच्चे जब इस तरह का माहौल देखते हैं तो उसका असर ये होता है की वो बढते हुए अपने बाल मन में अहंकार और भेदभाव वाली भावना को भी बढ़ाते जाते हैं जिसका असर एकता और सौहाद्र की कमी होती है

इस पूरे घटनाक्रम में नुकसान केवल एकता और सौहाद्र का ही नहीं है बल्कि पर्यावरण का भी है. लोग खुद को बड़ा साबित करने के लिए उस होलिका को बड़ा बनाते जाते हैं जिसका प्रतिनिधित्व वो लोग करते हैं और उसका नतीजा होता है सामान्य से कई गुना अधिक लकड़ी और कन्डो की खपत होती है जो की वातावरण को गरम करने का काम करती है.


ये तो हुई एकता की कमी की बात इसके साथ ही सौहाद्र और भाई चारा भी इस तरह से कम हो रहा है की पहले तो पूरा मोह्ल्ल्ला एक हो कर होली मनाता था और दुसरे मोहल्लो में गेर निकलते हुए जाता था लेकिन अब हर होली के आस पास रंग खेले जाते हैं और दूसरों की तरफ से आने वालो के लिए एक तिरस्कार पूर्वक व्यव्हार का प्रदर्शन किया जाता, रंगों की बजाय कीचड़ और नुकसान देह वस्तुओ का प्रयोग किया जाता है जो की भाई चारे और सौहाद्र की बलि ले लेते हैं

आइये हम सब मिल कर कोशिश करे इस दूरी में कमी लाने की और पर्यावरण को भी बचाने की


Monday, March 21, 2011

अफसरो, नेताओं तथा पदाधिकारियों के लिए एक चिट्ठी और सत्याग्रह



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श्री मान

विन्रम निवेदन के साथ आपको ये पात्र लिख रहा हूँ.

मै इस देश का एक आम नागरिक हूँ और मुझे लगता था की मै गरीब हूँ हालाकि मै खुद को कभी गरीबी रेखा के नीचे नहीं मानता था और गरीबी रेखा के किसी लाभ को मैंने लेने की कोशिश नहीं करी परन्तु फिर भी मै खुद को गरीब तो मानता ही था, लेकिन जब पता चला की भारतीय योजना आयोग और भारत सरकार के अनुसार हमारे देश में गरीबी का पैमाना १२ रूपये और १७ रुपये के खर्च का है तो मुझे खुद पर शर्म आने लगी, शर्म इस बात को ले कर थी की मै खुद को गरीब कैसे मान सकता हूँ जब की मै रोज १७ रूपये से ना जाने कितने ज्यादा पैसे खर्च करता हूँगा किसी ना किसी तरह से. फिर मैंने जब देखा की मै तो गरीब नहीं हूँ तो मै शहर में गरीबो को देखने निकला था और मुझे एक भी ऐसा गरीब नहीं मिला जो भारतीय योजना आयोग के अनुसार गरीब हो.

हालाकि माननीय उच्चतम न्यायलय के अनुसार ये गलत है और इसमें बदलाव की जरूरत है.

पर मेरे पास आप के लिए मात्र दो सवाल है

पहला है ये बदलाव माननीय उच्चतम न्यायलय के आदेश के बाद ही क्यों होने वाले हें, क्या समस्त अफसरों और नेताओ का कोई फर्ज नहीं बनता उन लोगो के लिए जिनकी वजह से वे सब पदों पर आसीन है या जिनकी मदद करने के लिए उन्हें ये कुर्सी मिली है. क्या उन्हें इस कुव्य्स्था पर ऊँगली नहीं उठाना चाहिए थी.

और दूसरा सवाल ये है "क्या आप इस बारे में सरकार को अपनी राय देंगे की गरीबी का पैमाना क्या होना चाहिए?"

कृपया मेरी बातो को व्यक्तिगत रूप से ना लेवें, और ना ही मुझे आप से किसी भी सवाल का जवाब चाहिए पर आपको एक खुद को गरीब समझने वाले हिन्दुस्तानी के मन की भावनाये बताना चाहता था इस लिए ये पूरा चिठ्टा आप को लिख कर भेज रहा हूँ साथ ही कुछ और ऐसे लोगो तक भी पहुँचाने की कोशिश करूँगा जिनसे मै इस बात की उम्मीद कर सकता हूँ की वो गरीबो को न्याय दिलवाएंगे

मै कोई नेता नहीं हूँ ना ही कोई समाजसेवक और ना ही कोई क्रांतिकारी या आंदोलक पर मै समझता हूँ की जब तक हम इन सब के भरोसे बैठे रहेंगे हमारा कुछ नहीं होगा इस लिए इस बार मै ये कदम उठाते हुए अकेले ही नेता, मंत्री और कलेक्टर तक मेरे दिल की बात एक चिट्ठी से पहुँचाने की कोशिश करूँगा. अगर आप को लगता है की मेरा रास्ता सही है तो आप इसमें मेरा साथ दे.

कुछ लोगो ने मुझे ये भी कहा है की कोई भी तुम्हारी चिट्टी को पढ़ेगा भी नहीं, पर मै फिर भी मेरी इस कोशिश को शुरू करूँगा और कोशिश करूँगा की ये काम मै हर उस संवेदनशील मुद्दे के लिए करता रहूँ जहा मेरी समझ हो

इस चिट्ठी के साथ विनम्र निवेदन सहित चार लेख भी जोड़ रहा हूँ जो की मैंने मेरे ब्लॉग के लिए लिखे थे.

ये चिट्ठी आप तक इस उम्मीद के साथ भेज रहा हूँ की आप शायद इस मामले में कुछ कर सकते हो.

धन्यवाद
भवदीय
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ये चिट्टी मै मेरे शहर के उन व्यक्तियों तक पहुँचाने की कोशिश करूँगा जो शायद इस व्यस्था को बदलने की क्षमता रखते हैं (क्रप्या ध्यान दें बदलने की कोशिश करना और क्षमता होना दोनों अलग अलग बाते हैं) और मै इश्वर से ये प्रार्थना करूँगा की वो लोग कम से कम इस बदलाव के लिए कोशिश जरूर करें.

इस चिट्ठी के साथ मै मेरी पुरानी चार ब्लॉग पोस्ट भी शामिल करूँगा.

हमें गरीब ना कहना हम मान हानि का मुकद्दमा कर देंगे
क्या आप किसी गरीब इंसान को जानते हें अगर हाँ तो मुझे जरूर बताये
एक दिन में १७ रूपये से कम खर्च करने वाले व्यक्ति
किसी को गरीब बोलने के पहले किन बातों का ध्यान रखें


अगर आप को लगता है मेरा रास्ता सही है और इससे कोई भी बदलाव आ सकता है तो क्रप्या आप भी इस कड़ी को आगे बढ़ा कर मेरा साथ दें और अपने शहर के अफसर और नेताओ तक इस बात को पहुँचाने में योगदान दे

ये एक सत्याग्रह है जिसमे एक बदलाव की उम्मीद की जा सकती है

धन्यवाद

Friday, March 18, 2011

किसी को गरीब बोलने के पहले किन बातों का ध्यान रखें

जैसा की मैंने मेरी पिछली पोस्ट एक दिन में १७ रूपये से कम खर्च करने वाले व्यक्ति में कहा था अगली पोस्ट में ये लिखूंगा की किसी को गरीब बोलने के पहले किन बातों का ध्यान आपको रखना चाहिए ताकि वो आप पर मानहानी का मुकद्दमा ना कर सके.

यू तो मै पहले ही काफी कुछ लिखा चूका हूँ जिससे आप ये तय कर सकते हें की कौन गरीब है और कौन गरीब नहीं है, लेकिन फिर भी कुछ और ऐसी बाते लिखना चाहूँगा जिससे आप को ये तय करने में आसानी रहे की सामने वाला इंसान गरीबो

की श्रेणी में आता है की नहीं अन्यथा ऐसा ना हो जाये की आप तो उन्हें गरीब बोले और वो आप पर मान हनी का मुकद्दमा कर दें.

आप किसी को भी गरीब बोलने के पहले कुछ बिन्दुओ पर ध्यान दे दें और अगर आप को लगता है की सामने वाले व्यक्ति पर इनमे से कोई भी बिंदु उपयुक्त बैठ रहा है तो क्रप्या उसे गरीब ना कहे. इन सभी बिन्दुओ को रखने का कारण विस्तार पूर्वक किसी और पोस्ट में लिखूंगा यहाँ संक्षेप में कोशिश कर रहा हूँ.

क्या व्यक्ति रोज नहाता है, साबुन और तेल में २-३ रूपये का खर्च तो लग ही जायेगा
क्या व्यक्ति के पास २ जोड़ से ज्यादा कपडे हें कम से कीमत वाले कपडे खरीदने पर भी उसके एक दिन का खर्च २ रूपये तो हो ही जायेगा
क्या व्यक्ति किसी सवारी वाहन में यात्रा करता है, कम से कम दूरी के लिए भी किराया ३ रूपये तो होता ही है और दूरी के हिसाब से बढ़ता जाता है
या फिर व्यक्ति के पास खुद का सवारी वाहन जैसे की साइकिल है, महीने में कम से कम ३० रूपये तो खर्च हो ही जायेंगे साईकिल पर इस तरह दिन का १ रुपया
व्यक्ति कही बाहर चाय भी पीता है क्या, यदि हाँ तो मात्र एक चाय के भी ५ रूपये लग ही जायेंगे
यदि व्यक्ति कोई नशा जैसे की बीडी,तम्बाखू या गुटखा खाने का शौक़ीन है तो फिर तो वो गरीब हो ही नहीं सकता क्यों की ये व्यक्ति तो नशा खोरी करता है और ये तो अय्याशी है कोई मजबूरी नहीं
क्या व्यक्ति पैरों में जूते या चप्पल पहनता है क्योंकि अगर जूते/चप्पल पहनता है तो भी दिन का एक २ रुपया तो वो खर्च कर ही रहा है
क्या व्यक्ति के पास मोबाइल फोन है यदि हाँ तो दिन का २ रुपया तो वो जरूर खर्च करता ही है (मोबाइल कपंनी के नियम के मुताबिक एक नंबर को कम से कम २०० रूपये १८० दिन में खर्च करना ही होंगे )
क्या व्यक्ति २ समय का खाना खाता है, यदि जवाब हाँ है तो भूल जाइये की ये व्यक्ति गरीब हो सकता है क्योंकि एक वक्त के खाने के लिए भी कम से कम १२-१५ रूपये लग जाते हें तो फिर सामने वाला व्यक्ति गरीब कैसे हो सकता है

तो आगे आप जब भी किसी को गरीब कहे तो इन बातों के बारे में सोच अनुमान लगा लीजियेगा की क्या सामने वाला व्यक्ति गरीब हो सकता है

इस पोस्ट की श्रंखला को अब खत्म करूँगा लेकिन इसके बाद एक चिट्ठी लिखने वाला हूँ जो की मै शहर के महापौर, कलेक्टर, मौजूद मंत्री और अखबार तक वो चिट्टी और मेरी पिछली तीन और ये पोस्ट पहुँचाने की कोशिश करूँगा मेरा आक्रोश दिखाने के लिए. अगर आप को लगता है की मै सही कर रहा हूँ और आप इस में मेरा साथ देना चाहते हें तो आप भी यही कोशिश कीजिये

चिट्ठी के लिए यहाँ क्लिक करे

अफसरो, नेताओं तथा पदाधिकारियों के लिए एक चिट्ठी और सत्याग्रह

Thursday, March 17, 2011

एक दिन में १७ रूपये से कम खर्च करने वाले व्यक्ति

मै उन लोगो को ढूंढ रहा था जो गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले लोग है और पूरी ईमानदारी से गरीब है (भारतीय योजना आयोग के अनुसार शहर में दिन में १७ रूपये से कम खर्च करने वाले लोग)  पर मुझे ऐसे लोगो को ढूँढने में कोई सफलता नहीं मिली. मेरी पिछली पोस्ट पढ़े क्या आप किसी गरीब इंसान को जानते हैं

इसके बाद मै जाने क्या सोचता हुआ मंदिर सीढियों पर ही याचको के पास ही बैठ गया था और जाने कितने मिनट तक बैठा रहा और जाने कब तक बैठा भी रहता अगर मुझे एक पुलिस वाले साहब ने झकझोर कर उठाया ना होता.

पहला सवाल जो उन्होंने किया था वो ये था "बेटा किसी अनजान के हाथ से तुमने कुछ खाया पिया तो नहीं है?" मैंने ना में सर हिलाया फिर उन्होंने मेरा मुह सूंघा और कोई बदबू ना आने पर पूंछा "तुम कोई नशा तो नहीं करते हो ना?" मैंने फिर ना में सर हिला दिया. उन्होंने मुझे वहाँ से उठाया और एक बेंच पर बैठा दिया, पानी पिलाया और फिर बोले कपडे से अच्छे घर के जान पड़ते हो कह रहे हो कोई नशा भी नहीं करते फिर वहाँ भिखारियों के बीच क्यों बैठे हुए थे

बिना उनकी तरफ देखे मैंने कहा भिखारी तो गरीब होते हैं ये लोग गरीब नहीं है फिर ये भिखारी कैसे हुए!

उन्होंने कहा "क्या मतलब"!

मैंने उनकी तरफ देखा और फिर सवाल कर दिया "क्या आप गरीब है?" वो अचकचाए और फिर बोले "हाँ". मैंने अगला सवाल भी कर दिया "आप दिन में कितने रूपये खर्च करते हो?" ये सवाल तो उनके लिए पिछले सवाल से भी ज्यादा मुश्किल

साबित हो रहा था थोड़ी देर रुके फिर बोले "तुम्हारे कहने का मतलब क्या है?" मै भी अब तक वापस दुनिया में आ चूका था मुझे लगा की मै क्या कर रहा हूँ लेकिन फिर मैंने जवाब दिया "आपके हिसाब से आप गरीब है तो तस्दीक करना चाहता हूँ

की सच में आप गरीब ही है, और वो आपके खर्च किये जाने वाले रूपये से ही पाता हो पायेगा" उन्होंने जवाब दिया २-३ रूपये से ज्यादा खर्च नहीं करना पड़ता.

मैंने एक बड़ा सा प्रश्नवाचक चिन्ह आँखों में बनाते हुए उनकी तरफ देखा तो वो बड़े प्यार से बोले "गुटखा खाता हूँ लेकिन पान की दुकान वाला पैसे नहीं लेता, सब्जी मंडी से सब्जी खरीदता हूँ तो सब्जी वाला पैसे नहीं लेता, सुबह शाम की चाय के

लिए चाय वाला पैसे नहीं लेता और गाडी का पेट्रोल सरकारी खर्चे पर चल जाता है"

इसके बाद उन्होंने मुझ से पूंछा क्या मै ठीक हूँ.. मैंने हाँ में सिर्फ हिलाया तो वो मुझे वही छोड़ कर चले गए. इन पुलिस वाले सज्जन का नाम मै नहीं जानता मैंने नाम प्लेट नहीं पढ़ी अगर देखा होता तब भी ना लिखता.

वो साहब तो चले गए लेकिन मुझे ये बता गए की वो दिन में १७ रूपये खर्च नहीं करते हैं .....

इसके बाद मैंने मेरे मित्र के एक मित्र को फोन कर उनसे उनके दिन भर के खर्च को जानने की कोशिश की तो जवाब लगभग वही था जो पुलिस वाले साहब ने दिया था. ये महोदय एक सरपंच हैं.

मैंने फिर एक और साहब को फोन लगाया जो एक सरकारी दफ्तर में बाबु हैं उनसे जब उनके खर्च का पूंछा तो उनका जवाब भी कुछ ऐसा ही था जिसमे वो १७ रूपये वाली सीमा से बाहर नहीं निकल रहे थे

तो अब मुझे लगता है की जिन ४ करोड लोगो की बात योजना आयोग कर रहा है वो सभी लोग पुलिस वाले, नेता और सरकारी अधिकारी कर्मचारी होंगे.

अभी गुबार पूरी तरह से फटा नहीं है और इसी विषय पर और लिखूंगा जिसमे आपको ये बताऊँगा की किसी को गरीब बोलने के पहले किन बातों का ध्यान आपको रखना चाहिए ताकि वो आप पर मानहानी का मुकद्दमा ना कर सके

क्या आप किसी गरीब इंसान को जानते हें अगर हाँ तो मुझे जरूर बताये


जब एक सफाई करने वाले कपडे को चौराहे पर बेचने वाला मासूम बच्चा या भूखा रहने वाला मेहनतकश ईमानदार इंसान गरीब नहीं हो सकता (जानने के लिए मेरी पिछली पोस्ट हमें गरीब ना कहना हम मान हानि का मुकद्दमा कर देंगे  पढ़े ) तो सोच रहा था की गरीब कौन हो सकता है.

यही सोचते सोचते सड़क पर निकल गया ये देखने के लिए की कोई तो होगा जो सरकार के अनुसार गरीबी रेखा के नीचे आता हो, जो पूरी ईमानदारी से गरीब हो

मै सड़क पर निकला और हर उस इंसान से पूंछने लगा जो मुझे गरीब लगा "क्या आप गरीब है" उनका जवाब तो हाँ था लेकिन वो ईमानदार गरीब लोग नहीं थे क्योंकि वो सब के सब १७ रूपये से ज्यादा खर्च करने वाले लोग थे

मुझे एक साइकिल का पंक्चर बनने वाला दिखा मैंने उससे पूंछा क्या आप गरीब हें तो उसका जवाब था हाँ, मैंने पूंछा दिन में कितना खर्च करते हें आप तो जवाब मिल बस २ चाय पीता हूँ और २-३ गुटखे खाता हूँ मैंने हिसाब लगाया तो ये तो १७

रूपये से ज्यादा हो रहा है क्यूँ की उन्हें खाना भी तो खाना ही होता होगा मतलब की ये साहब भी गरीब नहीं है.

मै और आगे गया देखा एक साहब बड़ी ही शांति से जूतों की मरम्मत का काम कर रहे थे, मैंने उनसे भी सवाल किया जय आप गरीब है तो उनका जवाब था हाँ, मैंने फिर सवाल किया आप दिन में कितना रुपया खर्च करते हें तो अजीब सी नजरो से देखते हुए जवाब दिया की यही कुछ १२-१३ रुपये चाय पानी मिला कर और १० रूपये बस से घर आने जाने का किराया. मुझे यहाँ भी निराशा ही मिली ये साहब भी गरीब नहीं थे.

मै आगे बढ़ता रहा और हर वो शख्स जो मुझे गरीब लगा मैंने उससे यही दो सवाल किये "क्या आप गरीब है" और "आप दिन में कितना पैसा खर्च करते हें" कमोबेश जवाब भी हर बार लगभग एक जैसे ही थे सिर्फ शब्दों और संख्याओ में मामूली सा अंतर था, लेकिन एक और बात जिसमे मुझे समानता दिखी वो थी उनकी आँखे जिनमे एक जैसे सवाल थे "क्या आप हमारा अपमान करने के लिए ये सब पूँछ रहे हैं " और उनकी आँखों के इस सवाल का मेरे पास कोई जवाब नहीं था

मै ये सुन कर लगभग हिम्मत हारता हुआ शहर के एक मंदिर के बाहर पहुंचा और वह बैठे एक याचक से यही दो सवाल कर लिए और ये उम्मीद करने लगा की यहाँ तो मुझे कोई सफलता मिलेगी गरीबो को ढूँढने में लेकिन अफ़सोस मेरी किस्मत यहाँ भी मुझे निराशा ही मिली क्योंकि वो याचक भी १७ रूपये से ज्यादा खर्च करता था

पर इस निराशा से भी मुझे गर्व हुआ ये जान कर की हमारे देश में कोई गरीब नहीं है.

इस सब को देखने के बाद मेरा मन हुआ की मै केन्द्र सरकार और योजना आयोग के राज्य सरकारो पर लगे आरोपों को सही मान लूं जिसमे योजना आयोग का कहना था की देश में ४ करोड से ज्यादा गरीब तो हो ही नहीं सकते लेकिन राज्य सरकारों ने जो संख्या BPL से नीचे जीने वाले लोगो की भेजी है वो इससे कही ज्यादा है.

मेरे अनुभव के आधार पर तो मै यही कहूँगा की ४ करोड भी ज्यादा ही है..

अभी गुबार पूरा फटा नहीं है और इसी विषय पर अगली कड़ी में पढ़े लिखने वाला हूँ एक दिन में १७ रूपये से कम खर्च करने वाले लोग  क्योंकि मुझे कुछ ऐसे लोग भी मिले हैं जो की १७ रूपये से कम खर्च करते हैं एक दिन में उनके बारे में पढ़ें .

एक दिन में १७ रूपये से कम खर्च करने वाले लोग 

हमें गरीब ना कहना हम मान हानि का मुकद्दमा कर देंगे

जी हाँ हो सकता है की जल्द ही ये बात सुनने को मिल जाये किसी ऐसे शख्स से जो की आपकी नजरो में गरीब हो


सरकार के योजना आयोग के मुताबिक गांव में 12 रु और शहर में 17 रु से अधिक खर्च करने वाला व्यक्ति गरीब नहीं समझा जाता।

खबर के लिए यहाँ क्लिक करे 

कुछ दिन पहले मेरे परम मित्र के साथ बस स्टैंड के किनारे लगी दुंकन पर खाना खाने चला गया था, कुछ ५-६ साल बाद गया था तो इस उम्मीद में था की खाने के कीमत में कम से कम ३ गुना बढोतरी तो हो ही गई होगी लेकिन देखा की वहाँ आज भी १५ रूपये में इतनी पूरियाँ और सब्जी मिल जाती हें की एक स्वस्थ इंसान का पेट भर सके और कोई गरीब इंसान तो उतने खाने में निहाल ही हो जाये. मैंने खाना खाने के बाद दुकान के मालिक को सम्मान सहित धन्यवाद दिया की आपने आज भी इतनी कम कीमत पर लोगो को खाना खिलाना जारी रखा है.

दुकानदार महोदय का जवाब था की हम गरीब भी दो पैसे कमा लेते हें और गरीब इंसान का पेट भी भर जाता है, इश्वर सेवा अलग से हो जाती है और क्या कहे. उनकी बाते सुन कर दिल गदगद हो गया था और दिल से ढेर सारी दुवाए निकली थी 

उनके भोजनालय और उनके लिए पर सोचता हूँ आज जा कर उनसे वो सारी दुवाए वापस मांग कर ले आऊँ साथ ही उन्हें खरी खोटी भी सुना दूं की खुद को गरीब कहते हो और ये कहते हो की गरीबो का पेट भर जाये लेकिन गरीबो को खाना खिलाने 

के लिए दिन में ३० रूपये लूट लेते हो, ये कहाँ का परोपकार है तुम्हारा, तुम गरीबो के साथी नहीं उनके दुश्मन हो क्यूँ की गरीब इंसान तो दिन में १७ रूपये से ज्यादा खर्च कर ही नहीं सकता और अगर वो खर्च कर रहा है तो गरीब नहीं हो सकता मतलब की तुम्हारे यहाँ सिर्फ पैसे वाले लोग खाना खाने आते हें गरीब नहीं.

आज जब घर से निकला तो सोचते हुए निकला की कौन गरीब होगा 
यही सोचते हुए रास्ते में निकला तो चौराहे पर देखा एक मासूम बच्चा मुलायम कपडे बेच रहा था जो की गाडी या कंप्यूटर साफ करने के काम में लिए जा सकते थे, उससे पूँछ लिया की दिन भर में कितना कमा लेते हो तो बोला ५०-६० रूपये कमा लेता हूँ और मैंने पूंछा की खर्च कितना करते हो तो बोला "पूरा पैसा खाने में ही खर्च हो जाता है कभी कभी कम पैसे मिलते हें तो सिर्फ एक वक्त ही खा पाता हूँ"  मैंने सोचा ये गरीब नहीं हो सकता जो लड़का दिन के ५० रूपये खाने में खर्च करे वो गरीब कैसे होगा क्यूंकी गरीब इंसान तो १७ रूपये से ज्यादा खर्च कर ही नहीं सकता.

सोचते सोचते सर दर्द करने लगा तो जाने कैसे एक छोटी सी चाय की दुकान पर बैठ गया वहाँ देखा एक गरीब सा दिखने वाला इंसान आया जिसे देखने से ही ऐसा लग रहा था मनो गरीबी की देवी ने उसके शरीर तो शरीर आत्मा को भी अपना मूल 

निवास स्थान बना लिया है. मै चाय पी रहा था तो देखा उस गरीब से दिखने वाले व्यक्ति ने एक चाय ली और बात ही बात में खत्म कर के दूसरी चाय भी मांग ली, चाय खत्म करने के बाद उसने दुकान दार को जेब से १० रूपये का नोट निकाल 

कर दिया,एक बड़ा सा बोरा उठाया और रास्ते पर चलता बना. 

जाने क्यों मैंने दुकानदार से उस व्यक्ति के बारे में पूँछ लिया तो दुकानदार ने उस व्यक्ति पर बड़ी ही दयनीयता दिखाते हुए कहा गरीब इंसान है साहब, पर बड़ा ही ईमानदार और भला, कोई बुरी आदत भी नहीं है कोई नशा नहीं करता बस चाय का 

बड़ा प्रेमी है दिन भर में ६-७ चाय पी जाता है. दिन भर यहाँ वहा से प्लास्टिक की खाली बोतले और दूसरा फालतू सामान ढूँढता रहता है और उसे ही बेच कर चाय पीता है और कभी एक वक्त तो कभी दोनों समय का खाना खाता है, कभी कभी 

ऐसा भी होता है की ज्यादा पैसे नहीं जमा कर पाता तो सिर्फ चाय पी कर पूरा दिन निकाल देता है. 

दुकानदार ने कहा था गरीब इंसान है लेकिन मै सोचता हूँ जो इंसान दिन भर में ३०-३५ रूपये की चाय पी जाता हो (खाना ना खा पाता हो वो अलग बात है) वो गरीब कैसे हो सकता है क्योंकि गरीब इंसान तो १७ रूपये से ज्यादा खर्च कर ही नहीं सकता.

अभी गुबार फटा नहीं है इसी विषय की अगली कड़ी मे और लिखा है

क्या आप किसी गरीब इंसान को जानते हैं  अगर हाँ तो मुझे बताये जरूर 

कृपया अपनी राय अवश्य दें 

Tuesday, March 15, 2011

होली के हुडदंग की मलीनता और संस्कृति के ठेकेदारों से एक सवाल


होली है भाई होली है बुरा ना मानो होली है..............

सालो पहले पहले इन शब्दों को सुनकर दादा जी ने मुझसे कहा था बेटा ये मस्ती में सराबोर ऐसे कुछ शब्द जो की दुश्मन को भी दोस्त बना दे, वर्षों से चली रही दुश्मनी को भी मिटा दे, रिश्तों की गरिमा में एक ऐसी मिठास घोल दे जिसका जायका सालो साल फीका पड़े, लेकिन आज जब इन्ही शब्दों को सुनता हूँ तो एक अजीब सा डर लगता है.

होली का वो हुडदंग तो आज भी नजर आता है लेकिन उसमे आत्मीयता और प्यार नहीं नजर आता ना ही उस हुडदंग पर लोगो का विश्वाश नजर आता है. शायद विश्वाश ना करने की वजह ये है की हम सब ने अपने दिल और आत्मा पर इतना मैल लपेट लिया है की रंग अब दिल पर चढ़ने ही नहीं पाता.

आज लोग होली के बहाने दिलो से दिल मिलाने के बजाय और दूरियों को बढ़ा लेते हैंदुश्मनी खत्म करने के बजाय एक दुसरे के दिलो में भरी नफरत की आग को सुलगा कर और बढ़ा ही लेते हैं और रिश्तों की मिठास के बजाय उसमे ऐसे कड़वाहट डाल दी जाती है जिसका असर जाते जाते अरसा निकल जाता है

आज जब होली के हुडदंगी टोली बना कर गलियों में निकलते हैं, तो माँ बाहर या छत की मुडेर से टिक कर खड़ी बेटी है को एक धमकी भरे अंदाज में डांट लगाते हुए घर में जाने का आदेश दे देती है, और इसका कारण सिर्फ इतना होता है की माँ उन हुडदंगियो पर भरोसा ही नहीं कर पाती क्यूँ की माँ को हर हुडदंगी में ऐसा इंसान नजर आता है जो होली के बहाने छेड़खानी करने का बहाना ढूढंता है.

मै मा की इस भावना को तो गलत नहीं मानूंगा आज हालत ही ऐसे हैं लेकिन इस वजह से एक सवाल उन सभी संगठनों से जरूर पूंछना चाहूँगा जो खुद को भारतीय संस्कृति का संरक्षक होने का दंभ भरते हैं और प्रेम दिवस के खिलाब बड़े बड़े आन्दोलन करने की बात करते हैं, बिना किसी अधिकार के चौराहों पर बेचने के लिए लाल गुलाब ले कर खड़े किसी मासूम बच्चे से फूल छीन कर नाली में बहा देते हैं और बड़ी ही शालीनता से अपने प्रेम का निवेदन करने वाले युवको को भी पीट पीट कर लहू लुहान कर देते हैं.

क्या उन्हें होली पर होने वाली भारतीय संस्कृति की क्षति नजर नहीं आती.

क्या इन संगठनों को ये दिखाई नहीं देता की ये  होली की आड में जो जबरन मस्ती और छीटाकशी लड़कियों पर की जाती है वो गलत है, क्या भारतीय संस्कृति की रक्षा करने का दंभ भरने वाले इन संगठनो का  इसमें नारी और संस्कृति का अपमान नहीं दिखाई पड़ता.

जहा तक मेरी जानकारी है पहले फाग दिवस प्रेम दिवस का ही दूसरा नाम था लेकिन आज होली है के बहाने किसी महिला से होली खेलते समय ये कोशिश की जाती है की जितना नारी शरीर को भोगा जा सके भोग लिया जाये. 

मै खुद को कोई बहुत समझदार या ज्ञानवान व्यक्ति नहीं समझता हूँ लेकिन फिर भी ये बात अगर मेरे समझ में आती है तो क्या ऐसे संगठनों के पदाधिकारीयों को समझ में नहीं आ सकती और क्या उनकी कोई जिम्मेदारी नहीं बनती इस बारे में कुछ करने की

अगर कोई ये कहे की ये भारतीय संस्कृति का अंग है और हम इसे गलत नहीं मानते तो मै उन सभी से यही कहूँगा की फिर प्रेम दिवस पर भी अपनी नाक दूसरों के मामले में अडाना बंद कर के जिए और जीने दे.

मै मानता हूँ की कुछ बाते लोगो को गलत लग सकती है लेकिन मैंने मेरा आँखों देखा लिखा है और कुछ नहीं जिन लोगो को मेरी बाते गलत लगी हो उनसे हाथ जोड़ कर क्षमा चाहूँगा 

अभी बस नहीं किया है बात निकली है तो दूर तलक जायेगी 

Monday, March 14, 2011

बचपन की यादो के झरोखे से


कल देखा गली में कुछ लडको को खेलते हुए
तो मुझे भी मेरा बचपन याद आ गया

ऐसा लगता है जैसे कल की ही वो बात थी

कंचो से कंचे टकराते और फिर किसी कंचे को निशाना लगाते
दांव लगा तो सब अपना वर्ना हम गुस्से से भुनभुनाते

ले कर डंडा और एक छोटी सी गुल्ली
सारा दिन सडको पर एक दुसरे से दौड लगवाते

कभी लट्टू घुमाते और साथियों को छकाते
तो कभी गुलाम डंडी खेलते
पत्थरो के सहारे लकड़ी ले दूर तक निकल जाते

कभी चोर पुलिस खेलते जब
तो किसी के भी घर में जा कर छुप जाते
या कही किसी पेड को थोड़ी देर के लिए आपना किला बनाते


गलिया तो आज भी वही है
लेकिन अब कंचो की आवाज नहीं आती

लड़के तो आज भी है लेकिन
वो ना लट्टू घुमाते हैं ना लकडियों से किसी को छकाते हैं

चोर पुलिस कोई खेले भी तो कैसे
पेड तो बचे ही नहीं मोहल्ले में अब
और किसी के घर में घुसने के पहले ही लोग बाहर भगाते हैं

गुल्ली डंडा तो कोई खेलता ही नहीं है
अब तो सारे लड़के क्रिकेट को ही अपना बनाते हैं

Thursday, March 10, 2011

क्यूँ लड़कियों को हमारे समाज में आज भी बोझ समझा जाता है

८ मार्च को कुछ ऐसा हुआ जिससे दिल बड़ा ही द्रवित हो गया चाह कर भी कुछ सोच नहीं पा रहा था तो सोचा अब इसी बारे में लिखू

उस दिन मेरे एक चाचा जी की छोटीबहु ने बेटी को जन्म दिया और उसके बाद उनके पूरे परिवार का मुह ऐसे उतर गया जैसे उस बच्ची ने जन्म ले कर कोई बहुत बड़ी गलती कर दी हो.

मुझे बच्ची के जन्म की जानकारी फोन कर के माँ ने दी लेकिन ये हिदायत भी दे डाली की मै वहाँ ना जाऊं. मैंने कारण पूंछा तो जवाब मिला घर पर बात करेंगे.

आम तौर पर ऐसा होना चाहिए की बच्चे के जन्म पर मिठाई तो बांटी ही जाना चाहिए लेकिन ना किसी ने मिठाई बांटी ना ही ऐसी कोई कोशिश की, मुझे माँ ने इस लिए मना करा था यदि मै जाता तो मिठाई जरूर ले कर जाता जो की चाचा के परिवार को अच्छा नहीं लगता.

मैंने जब घर पर पिता जी से इस बारे में मेरी राय राखी तो उनका जवाब था बच्ची शल्य क्रिया से हुई है इस लिए सब परेशान है तो कोई मिठाई बाँट नहीं पाया होगा पर उसी परिवार में आज से ६ महीने पहले एक बेटा हुआ था जो की ऐसी ही शल्य क्रिया से हुआ था पर तब पूरे परिवार में खुशियों की बहार थी, मुझे फोन कर कर उनके पूरे परिवार ने जानकारी दी और हर व्यक्ति ने कहा की मै चाचा बन गया हूँ और मिठाई ले कर आऊँ.

ये कैसा दोगलापन है हमारे समाज का, एक संतान के पैदा होने पर कर्जा ले कर भी घी के दिए जलाये जाते हैं लड्डू बांटे जाते हैं, और दूसरी संतान के जन्म पर पैसा होने पर भी कोई खुशिया नहीं मनाई जाती.

मेरी जानकारी में ये प्रसव २० दिन बाद होना चाहिए था इस लिए मैंने घर वालो से जब ये जानने को कोशिश की तो जो जानकारी मिली उससे एक नया सवाल सामने खड़ा हो गया

पता करने से मालूम हुआ की बहु (प्रसूता) इसके पहले मायके में थी और कुछ दिन पहले ही बहु के मायके वाले उसे यहाँ छोड़ कर गए थे उन सभी चिकत्सकीय जांचो के साथ जो उसके मायके में हुई थी और पता चला की उन्ही जांचो में से कुछ में इस तरह की तकलीफे दिख रही थी जो जच्चा और बच्चा दोनों के जीवन को मुश्किल में डाल सकती थी और ये सारी बाते जांचो पर चिकिस्तक के द्वारा साफ साफ लिखी हुई थी. चिकिस्तक की टिप्पणी से ये बात तो जाहिर हो जाती है की इस बाबद पूरी जानकारी बहु के मायके वालो को थी लेकिन सिर्फ इस लिए की हमारे पैसे खर्च ना हो उन लोगो ने ऐसे स्थिति में भी बहु को १००० किलोमीटर का सफर कराया और यहाँ आने के बाद भी जानकारी दिए बिना वापस चले गए.

मुझे हमेशा सिखाया गया है की हमारी परम्परा दुनिया की सबसे महान परम्परा है लेकिन अगर ये हमारी परम्परा का हिस्सा है तो हम कैसे श्रेष्ठ हो सकते हैं.
हम कैसे महान हो सकते हैं जब हम एक जननी को अपनी जान दांव पर लगा कर एक नए जीवन को इस दुनिया में लाने के बाद भी सिर्फ इस लिए तिरस्कृत करते हैं क्योंकि उसने एक लड़की को जन्म दिया है.
हम कैसे महान हो सकते हैं जब हम एक नन्ही जान के जन्म पर खुश होने के बजाय सिर्फ इस लिए दुखी होते हैं क्योंकि वो नन्ही जान एक कन्या है
हम कैसे महान हो सकते हैं जब हम एक लड़की के जन्म लेते ही उसे बोझ समझने लगते हैं, और उस लड़की की शादी के बाद ऐसा समझते हैं की एक बोझ दूर हो गया है

मेरी समझदानी की पिटारी बहुत छोटी है पर मै आज तक नहीं समझ पाया हूँ लड़कियों को पैदा होते ही क्यों बोझ समझा जाने लगता है और क्यों माँ बाप बेटी की शादी करने के बाद ये मानते हैं की हमारे सर से मुसीबत दूर हो गई, क्यूँ शादी के बाद माँ बाप भूल जाते है की बेटी अभी भी उनकी ही है

कुछ लोग बेटे इस लिए चाहते हैं ताकि उनके कुल का नाम आगे बढ़ सके मै ऐसे सभी लोगो से मेरा एक छोटा सा सवाल है जरा अपने दादा जी के दादा जी का नाम बताइए..अगर किसी के पास इस सवाल का जवाब है तब तो वो कुल की बात करे वर्ना ना करे

कुछ लोग कहते हैं की बेटा बुढ़ापे में हमारी देख भाल करेगा मेरा अगला सवाल "क्या आप आपके माँ बाप की उतनी सेवा कर पा रहे हैं जितनी आप आपके बेटे से उम्मीद कर रहे हैं" अगर आप का जवाब हाँ है तो मै कुछ नहीं कहूँगा लेकिन अधिकतर मौको पर ईमानदार जवाब ना ही होगा

इस विषय पर मैंने बस नहीं की है बात निकली है तो दूर तलक जायेगी.................

Tuesday, March 8, 2011

अभी अभी जन्मी बेटी का परिवार से मासूम सवाल



एक बेटी जब जन्म लेती है तो उसके बाद कई घरों में लोगो का हाव भाव बड़ा ही अजीब हो जाता है ऐसे समय में अगर वो बेटी अपने परिवार से सवाल कर सकती तो उसके सवाल शायद ऐसे ही कुछ होते
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मै बस अभी अभी इस दुनिया में आई हूँ
पर फिर भी आप सब मुझ से नाराज क्यूँ है..

भगवान जी ने मुझे यहाँ भेंजने के पहला कहा था
मेरे पहले रोने पर सभी खुशिया मनायेंगे
लेकिन यहाँ सभी इतने उदास क्यूँ है

माँ... भगवान जी ने मुझे यहाँ भेजते समय कहा था
की वहा मुझे दुसरे भगवान जी मिलेंगे जिसे मै माँ कहूँगी

मैंने उनसे पूंछा था की मै माँ को पहचानूंगी कैसे
तो वो बोले थे की माँ की आँखों में आंसू और चेहरे पर ढेर सारी खुशी होगी
तुम्हारी आँखों आंसू तो है पर चेहरे पर खुशी क्यों नहीं है
भगवान जी ने मुझ से कहा था
तुमने मुझे ९ महीने सब से बचा कर अपने पेट में रखा था
बहुत सारी तकलीफे उठाई थी
अब जब मै ठीक हूँ तो क्या तुम्हे खुशी नहीं हो रही है

भगवान जी ने ये भी बताया था की जब भैया आया था
तो दादा जी ने उसे उनका नया जन्म कहा था
तो फिर दादी जी आप मेरे होने पर क्यों कह रही हो
मै कुल को खत्म करने के लिए आई हूँ
क्या मै आपका नया जन्म नहीं हो सकती

चाचा, चाची, ताऊ, ताई आप लोग क्यूँ नाराज हो मुझ से
मैंने तो ना आपसे कुछ माँगा है और ना कोई उम्मीद है
फिर भी आप मेरे होने पर दुखी ही है

पापा क्या मै इतनी बुरी हूँ
की सब मेरे आने से इतना दुखी हो गए, रोने लगे.
भगवान जी ने मुझ से कहा था की मै जहा जा रही हूँ
वहाँ मुझे मेरे पापा मिलेंगे
जो मुझे सबसे ज्यादा प्यार करेंगे
भगवान जी से भी ज्यादा
वो मुझे कभी रोने नहीं देंगे,
कोई मुझे कुछ बोलेगा तो पापा उसको डांटेंगे
मै जो मांगूंगी वो मुझे ला कर देंगे
मेरा हमेशा ध्यान रखेंगे,
कोई गलती करूंगी तो भी गुस्सा नहीं होंगे

लेकिन पापा मैंने तो कोई गलती नहीं की
मैंने तो कुछ माँगा भी नहीं
फिर भी आप मुझ से क्यों गुस्सा हो

ये सब लोग मुझे गन्दा गन्दा बोल रहे है
तो आप इनको डांट क्यूँ नहीं लगाते

आप मेरे आने पर मिठाई भी नहीं बाँट रहे और खुश भी नहीं हो
लेकिन फिर भी मै आपको सबसे ज्यादा प्यार करूंगी
और हमेशा करती रहूंगी
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ये सवाल सभी पर लागू नहीं होते कुछ ऐसे लोग भी है जिनके लिए बेटी का होना परिवार का सम्पूर्ण होना होता है
उम्मीद है मैंने किसी का दिल नहीं दुखाया होगा अगर ऐसा हुआ है तो क्षमा चाहूँगा

Monday, March 7, 2011

हम अभी भी इंसान ही है

आज शाम को घर आ रहा था तो देखा की सड़क पर भीड़ लगी हुई थी

देख तो दो लड़के पड़े हुए थे लगभग बेहोशी की हालत में और दोनों बुरी तरह से खून में लथपथ थे

वहा रुका और पता किया तो पता चला की दोनों लड़के एक दुसरे से बुरी तरह से टकरा गए थे और बड़ी ही बुरी स्थिति में थे, ऐसे में मैंने सबसे पहला कम तो वही किया जो हर बार ऐसी स्थिति में करता हूँ एम्बुलेंस के लिए १०८ नंबर पर फोन किया और दूसरी तरफ से बड़ा ही त्वरित जवाब भी मिला. आपात व्यस्था को सारी स्थिति से अवगत कराने और पता देने के बाद मै लडको की तरफ मुड़ा तो देखा की वहाँ काफी लोग एकत्रित हो चुके थे जिनमे कई लड़के २०-२२ साल की उम्र के ही थे

वो सभी लड़के इन चोट खाए लड़की की तीमारदारी में लगे हुए थे कुछ लोगो ने गाडिया उठा कर कोनों पर लगा दी थी और कुछ उन लड़के की जेब देखने लगे ताकि लड़को के घर वालो को खबर की जा सके देख कर बड़ा अच्छा लगा

दोनों लड़के लगभग बेहोशी की हालत में थे और सर और बाजु से काफी खून निकल रहा था तो जब मैंने रुमाल निकाल कर एक लड़के के बाजू पर बंधा तो दुसरे लोगो ने अपना रुमाल निकाल कर देने में बिलकुल देर नहीं की.

इसी बीच मैं कोशिश करता रहा की दोनों लड़के होश में रहे और उनका खून बहना कम हो सके तो जो बात मुझे सबसे अच्छी लगी वो ये थी की वह मौजूद दुसरे लोग मेरी मदद के लिए अपने आप को प्रस्तुत कर चुके थे बिना इस बात की चिंता किये की उनके कपडे खून से खराब हो सकते हैं

मेरा मित्र साथ में ही था मैंने उससे कहा की पानी का इन्तेजाम कर तभी किसी ने मेरे हाथ में पानी की पूरी पैक बोतल थमा दी जो की उस व्यक्ति ने १२-१५ रूपये दे कर खरीदी होगी.

कुछ लड़के इस व्यस्था में लगे थे की भीड़ की वजह से वह हवा का आना जाना ना रुके.

थोड़ी देर बाद दोनों लडको के सम्बन्धी वहा पहुंचे और उन दोनों को अस्पताल ले गए.

ये सारा घटनाक्रम लगभग १५ मिनट चला और इस पूरे समय सारे लड़के आपात कालीन स्वयंसेवकों की तरह वही उपस्थित थे और सभी ने अपना अपना काम स्वयं ही बाँट लिया था बिना ये जानने की कोशिश किये की अगला व्यक्ति की धर्म या मजहब का है बड़ा है या छोटा है. दिल में सिर्फ एक भावना थी हमें इन लडको को सही हाथो में पहुँचाना है

ऐसा देख कर अच्छा लगा और दिल में उम्मीद का दिया फिर से इस उत्साह के साथ जलने लगा "हम अभी भी इंसान ही है "
 
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