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Thursday, March 10, 2011

क्यूँ लड़कियों को हमारे समाज में आज भी बोझ समझा जाता है

८ मार्च को कुछ ऐसा हुआ जिससे दिल बड़ा ही द्रवित हो गया चाह कर भी कुछ सोच नहीं पा रहा था तो सोचा अब इसी बारे में लिखू

उस दिन मेरे एक चाचा जी की छोटीबहु ने बेटी को जन्म दिया और उसके बाद उनके पूरे परिवार का मुह ऐसे उतर गया जैसे उस बच्ची ने जन्म ले कर कोई बहुत बड़ी गलती कर दी हो.

मुझे बच्ची के जन्म की जानकारी फोन कर के माँ ने दी लेकिन ये हिदायत भी दे डाली की मै वहाँ ना जाऊं. मैंने कारण पूंछा तो जवाब मिला घर पर बात करेंगे.

आम तौर पर ऐसा होना चाहिए की बच्चे के जन्म पर मिठाई तो बांटी ही जाना चाहिए लेकिन ना किसी ने मिठाई बांटी ना ही ऐसी कोई कोशिश की, मुझे माँ ने इस लिए मना करा था यदि मै जाता तो मिठाई जरूर ले कर जाता जो की चाचा के परिवार को अच्छा नहीं लगता.

मैंने जब घर पर पिता जी से इस बारे में मेरी राय राखी तो उनका जवाब था बच्ची शल्य क्रिया से हुई है इस लिए सब परेशान है तो कोई मिठाई बाँट नहीं पाया होगा पर उसी परिवार में आज से ६ महीने पहले एक बेटा हुआ था जो की ऐसी ही शल्य क्रिया से हुआ था पर तब पूरे परिवार में खुशियों की बहार थी, मुझे फोन कर कर उनके पूरे परिवार ने जानकारी दी और हर व्यक्ति ने कहा की मै चाचा बन गया हूँ और मिठाई ले कर आऊँ.

ये कैसा दोगलापन है हमारे समाज का, एक संतान के पैदा होने पर कर्जा ले कर भी घी के दिए जलाये जाते हैं लड्डू बांटे जाते हैं, और दूसरी संतान के जन्म पर पैसा होने पर भी कोई खुशिया नहीं मनाई जाती.

मेरी जानकारी में ये प्रसव २० दिन बाद होना चाहिए था इस लिए मैंने घर वालो से जब ये जानने को कोशिश की तो जो जानकारी मिली उससे एक नया सवाल सामने खड़ा हो गया

पता करने से मालूम हुआ की बहु (प्रसूता) इसके पहले मायके में थी और कुछ दिन पहले ही बहु के मायके वाले उसे यहाँ छोड़ कर गए थे उन सभी चिकत्सकीय जांचो के साथ जो उसके मायके में हुई थी और पता चला की उन्ही जांचो में से कुछ में इस तरह की तकलीफे दिख रही थी जो जच्चा और बच्चा दोनों के जीवन को मुश्किल में डाल सकती थी और ये सारी बाते जांचो पर चिकिस्तक के द्वारा साफ साफ लिखी हुई थी. चिकिस्तक की टिप्पणी से ये बात तो जाहिर हो जाती है की इस बाबद पूरी जानकारी बहु के मायके वालो को थी लेकिन सिर्फ इस लिए की हमारे पैसे खर्च ना हो उन लोगो ने ऐसे स्थिति में भी बहु को १००० किलोमीटर का सफर कराया और यहाँ आने के बाद भी जानकारी दिए बिना वापस चले गए.

मुझे हमेशा सिखाया गया है की हमारी परम्परा दुनिया की सबसे महान परम्परा है लेकिन अगर ये हमारी परम्परा का हिस्सा है तो हम कैसे श्रेष्ठ हो सकते हैं.
हम कैसे महान हो सकते हैं जब हम एक जननी को अपनी जान दांव पर लगा कर एक नए जीवन को इस दुनिया में लाने के बाद भी सिर्फ इस लिए तिरस्कृत करते हैं क्योंकि उसने एक लड़की को जन्म दिया है.
हम कैसे महान हो सकते हैं जब हम एक नन्ही जान के जन्म पर खुश होने के बजाय सिर्फ इस लिए दुखी होते हैं क्योंकि वो नन्ही जान एक कन्या है
हम कैसे महान हो सकते हैं जब हम एक लड़की के जन्म लेते ही उसे बोझ समझने लगते हैं, और उस लड़की की शादी के बाद ऐसा समझते हैं की एक बोझ दूर हो गया है

मेरी समझदानी की पिटारी बहुत छोटी है पर मै आज तक नहीं समझ पाया हूँ लड़कियों को पैदा होते ही क्यों बोझ समझा जाने लगता है और क्यों माँ बाप बेटी की शादी करने के बाद ये मानते हैं की हमारे सर से मुसीबत दूर हो गई, क्यूँ शादी के बाद माँ बाप भूल जाते है की बेटी अभी भी उनकी ही है

कुछ लोग बेटे इस लिए चाहते हैं ताकि उनके कुल का नाम आगे बढ़ सके मै ऐसे सभी लोगो से मेरा एक छोटा सा सवाल है जरा अपने दादा जी के दादा जी का नाम बताइए..अगर किसी के पास इस सवाल का जवाब है तब तो वो कुल की बात करे वर्ना ना करे

कुछ लोग कहते हैं की बेटा बुढ़ापे में हमारी देख भाल करेगा मेरा अगला सवाल "क्या आप आपके माँ बाप की उतनी सेवा कर पा रहे हैं जितनी आप आपके बेटे से उम्मीद कर रहे हैं" अगर आप का जवाब हाँ है तो मै कुछ नहीं कहूँगा लेकिन अधिकतर मौको पर ईमानदार जवाब ना ही होगा

इस विषय पर मैंने बस नहीं की है बात निकली है तो दूर तलक जायेगी.................

Tuesday, March 8, 2011

अभी अभी जन्मी बेटी का परिवार से मासूम सवाल



एक बेटी जब जन्म लेती है तो उसके बाद कई घरों में लोगो का हाव भाव बड़ा ही अजीब हो जाता है ऐसे समय में अगर वो बेटी अपने परिवार से सवाल कर सकती तो उसके सवाल शायद ऐसे ही कुछ होते
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मै बस अभी अभी इस दुनिया में आई हूँ
पर फिर भी आप सब मुझ से नाराज क्यूँ है..

भगवान जी ने मुझे यहाँ भेंजने के पहला कहा था
मेरे पहले रोने पर सभी खुशिया मनायेंगे
लेकिन यहाँ सभी इतने उदास क्यूँ है

माँ... भगवान जी ने मुझे यहाँ भेजते समय कहा था
की वहा मुझे दुसरे भगवान जी मिलेंगे जिसे मै माँ कहूँगी

मैंने उनसे पूंछा था की मै माँ को पहचानूंगी कैसे
तो वो बोले थे की माँ की आँखों में आंसू और चेहरे पर ढेर सारी खुशी होगी
तुम्हारी आँखों आंसू तो है पर चेहरे पर खुशी क्यों नहीं है
भगवान जी ने मुझ से कहा था
तुमने मुझे ९ महीने सब से बचा कर अपने पेट में रखा था
बहुत सारी तकलीफे उठाई थी
अब जब मै ठीक हूँ तो क्या तुम्हे खुशी नहीं हो रही है

भगवान जी ने ये भी बताया था की जब भैया आया था
तो दादा जी ने उसे उनका नया जन्म कहा था
तो फिर दादी जी आप मेरे होने पर क्यों कह रही हो
मै कुल को खत्म करने के लिए आई हूँ
क्या मै आपका नया जन्म नहीं हो सकती

चाचा, चाची, ताऊ, ताई आप लोग क्यूँ नाराज हो मुझ से
मैंने तो ना आपसे कुछ माँगा है और ना कोई उम्मीद है
फिर भी आप मेरे होने पर दुखी ही है

पापा क्या मै इतनी बुरी हूँ
की सब मेरे आने से इतना दुखी हो गए, रोने लगे.
भगवान जी ने मुझ से कहा था की मै जहा जा रही हूँ
वहाँ मुझे मेरे पापा मिलेंगे
जो मुझे सबसे ज्यादा प्यार करेंगे
भगवान जी से भी ज्यादा
वो मुझे कभी रोने नहीं देंगे,
कोई मुझे कुछ बोलेगा तो पापा उसको डांटेंगे
मै जो मांगूंगी वो मुझे ला कर देंगे
मेरा हमेशा ध्यान रखेंगे,
कोई गलती करूंगी तो भी गुस्सा नहीं होंगे

लेकिन पापा मैंने तो कोई गलती नहीं की
मैंने तो कुछ माँगा भी नहीं
फिर भी आप मुझ से क्यों गुस्सा हो

ये सब लोग मुझे गन्दा गन्दा बोल रहे है
तो आप इनको डांट क्यूँ नहीं लगाते

आप मेरे आने पर मिठाई भी नहीं बाँट रहे और खुश भी नहीं हो
लेकिन फिर भी मै आपको सबसे ज्यादा प्यार करूंगी
और हमेशा करती रहूंगी
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ये सवाल सभी पर लागू नहीं होते कुछ ऐसे लोग भी है जिनके लिए बेटी का होना परिवार का सम्पूर्ण होना होता है
उम्मीद है मैंने किसी का दिल नहीं दुखाया होगा अगर ऐसा हुआ है तो क्षमा चाहूँगा

Monday, March 7, 2011

हम अभी भी इंसान ही है

आज शाम को घर आ रहा था तो देखा की सड़क पर भीड़ लगी हुई थी

देख तो दो लड़के पड़े हुए थे लगभग बेहोशी की हालत में और दोनों बुरी तरह से खून में लथपथ थे

वहा रुका और पता किया तो पता चला की दोनों लड़के एक दुसरे से बुरी तरह से टकरा गए थे और बड़ी ही बुरी स्थिति में थे, ऐसे में मैंने सबसे पहला कम तो वही किया जो हर बार ऐसी स्थिति में करता हूँ एम्बुलेंस के लिए १०८ नंबर पर फोन किया और दूसरी तरफ से बड़ा ही त्वरित जवाब भी मिला. आपात व्यस्था को सारी स्थिति से अवगत कराने और पता देने के बाद मै लडको की तरफ मुड़ा तो देखा की वहाँ काफी लोग एकत्रित हो चुके थे जिनमे कई लड़के २०-२२ साल की उम्र के ही थे

वो सभी लड़के इन चोट खाए लड़की की तीमारदारी में लगे हुए थे कुछ लोगो ने गाडिया उठा कर कोनों पर लगा दी थी और कुछ उन लड़के की जेब देखने लगे ताकि लड़को के घर वालो को खबर की जा सके देख कर बड़ा अच्छा लगा

दोनों लड़के लगभग बेहोशी की हालत में थे और सर और बाजु से काफी खून निकल रहा था तो जब मैंने रुमाल निकाल कर एक लड़के के बाजू पर बंधा तो दुसरे लोगो ने अपना रुमाल निकाल कर देने में बिलकुल देर नहीं की.

इसी बीच मैं कोशिश करता रहा की दोनों लड़के होश में रहे और उनका खून बहना कम हो सके तो जो बात मुझे सबसे अच्छी लगी वो ये थी की वह मौजूद दुसरे लोग मेरी मदद के लिए अपने आप को प्रस्तुत कर चुके थे बिना इस बात की चिंता किये की उनके कपडे खून से खराब हो सकते हैं

मेरा मित्र साथ में ही था मैंने उससे कहा की पानी का इन्तेजाम कर तभी किसी ने मेरे हाथ में पानी की पूरी पैक बोतल थमा दी जो की उस व्यक्ति ने १२-१५ रूपये दे कर खरीदी होगी.

कुछ लड़के इस व्यस्था में लगे थे की भीड़ की वजह से वह हवा का आना जाना ना रुके.

थोड़ी देर बाद दोनों लडको के सम्बन्धी वहा पहुंचे और उन दोनों को अस्पताल ले गए.

ये सारा घटनाक्रम लगभग १५ मिनट चला और इस पूरे समय सारे लड़के आपात कालीन स्वयंसेवकों की तरह वही उपस्थित थे और सभी ने अपना अपना काम स्वयं ही बाँट लिया था बिना ये जानने की कोशिश किये की अगला व्यक्ति की धर्म या मजहब का है बड़ा है या छोटा है. दिल में सिर्फ एक भावना थी हमें इन लडको को सही हाथो में पहुँचाना है

ऐसा देख कर अच्छा लगा और दिल में उम्मीद का दिया फिर से इस उत्साह के साथ जलने लगा "हम अभी भी इंसान ही है "
 
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